Friday, December 30, 2011

२४ दिसम्बर : गांधीवाद


कोल्हापुर में राजाराम कॉलेजका वार्षिक छात्र  स्नेहमिलन 1952
पेरियार रामास्वामी स्मृति दिन 1973


हिन्दुओं के पवित्र कानून ठहराते है कि झाडुवाले की संतति झाडु मारकर ही जीवन जीयेगी। हिन्दु धर्म में झाडु मारने का काम पसंदका काम नहीं था परन्तु एक दबाव था। गांधीवाद ने क्या किया? झाडु लगाने का काम तो  उदात्त  सेवा है इस तरह की प्रशंसा करके उसे स्थायी बनाने का प्रयत्न किया।

२३ दिसम्बर : गांधीवाद



२२ दिसम्बर : गांधीवाद



जैसे कि वह गुस्सेसे लाल साम्यवादी हो उसी तरह श्री गांधी कभी कभी सामाजिक और आर्थिक विषयों  पर बोलते है। गांधीवाद का अभ्यास करनेवाले व्यक्तिको श्री गांधीके लोकशाहीके पक्षमें  तरफ़ा और पूंजीवाद विरोधी कभी-कभी विरोधाभासी विधानोंसे कभी आश्चर्य नहीं होगा। क्योंकि गांधीवाद किसी भी अर्थमें क्रांतिकारी सिद्धांत नहीं है। यह तो एक बढ़िया रुढिचुस्तता है। जब तक हिन्दका संबंध है तब तक वह "प्राचीनकाल की तरफ जाओ" का सूत्र उसके ध्वज पर दर्शाता प्रत्याघाती सिद्धांत है। गांधीवादका ध्येय हिन्दके मृत्युशैय्या पर पडे भयावह  अतीत  को प्रोत्साहित करनेका, सजीवन करने का है।

२१ दिसम्बर : गांधीवाद




पूना जिल्ला कानून पुस्तकालय समक्ष संसदीय लोकशाही पर बाबासाहब का वक्तव्य 1952


गांधीवाद एक विरोधाभास है। यह विदेशी शासनसे मुक्त यानि देश की प्रवर्तमान राजकीय रचनाको नाश करनेका दावा करता है। दूसरी तरफ यह एक वर्गके दूसरे वर्ग पर आनुवंशिक वर्चस्वको यानि शाश्वत वर्चस्वको बनाये रखने का प्रयत्न करता है। इस विडम्बनाके बारे में क्या स्पष्टता है?

२० दिसम्बर : गांधीवाद





महाडमें मनुस्मृति दहन 1927


वर्णव्यवस्था अगर जिंदा है तो वह भगवदगीता के कारण। मनुष्य के प्रकृतिगत गुण के आधार पर वर्णो की रचना हुई है। इस तरह की दलील करके गीता ने वर्णोव्यवस्था को तात्विक आधार दिया। वर्णव्यवस्था को सहारा देने तथा मजबूत बनाने के लिये भगवतगीता ने सांख्य तत्वचिंतन का उपयोग किया, वर्ना वर्णव्यवस्था बिल्कुल निरर्थक है ऐसा मान लिया जाता। उसका गले उतरे ऐसा आधार देकर वर्णव्यवस्था को नया जीवन देने का पर्याप्त तूफान भगवदगीता ने किया है।

१९ दिसम्बर : गांधीवाद















डॉ. पी. जी. सोलंकी जन्मजयंती 1976

श्री गांधीने ज्ञातिप्रथा की चर्चा को बदलकर वर्णप्रथा का स्वीकार किया। इससे गांधीवाद लोकशाही के विरुद्ध है, इस आरोपमें थोडा सा भी फर्क नहीं पडता। हकीकत में तो वर्ण का ख्याल ही ज्ञाति के ख्यालका जनक है।


१८ दिसम्बर : गांधीवाद




दलित शरणार्थीओ की भयानक परिस्थिति से नेहरु को वाकिफ किया 1947


श्री गांधी जानते है कि उनके ही गुजरात प्रांत में किसी जाति ने लश्करी इकाई  खड़ी नहीं किया है। यह सिर्फ विश्वयुद्धमें ही नहीं, परन्तु पिछले विश्वयुद्ध में जब श्री गांधीने ब्रिटीश शाहीवादके भरती एजेन्ट के रुपमें पूरे  गुजरातका  प्रवास किया था तब भी नहीं हुआ था। हकीकतमें तो सुरक्षाके लिये लोगोंका सेनाके रूप में जमावड़ा ज्ञातिप्रथाके तहत असंभव  है, क्योंकि सेनाके जमावड़ेके लिये ज्ञातिप्रथा के अंतर्निहित व्यावसायिक सिद्धांतकी सामान्य नाबूदी अनिवार्य है।